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महाशिवरात्रि
#1
Heart 
महाशिवरात्रि,  
4 मार्च सोमवार


संस्कृति में रात्रि शब्द का अर्थ है- वह जो तीन प्रकार की व्यथाओं से आप को मुक्त करे। यह तीन साधनों-शरीर, मन और वाणी को विश्राम देती है। 

? शाब्दिक अर्थ
शिवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है वह रात्रि जो तीन साधनों में शिवतत्व को समाहित करती है, वह तत्व जो सबसे परे है। समाधि को शिवसंयुज्ञ्न, शिव की उपस्थिति भी कहा जाता है, जिसका का वर्णन अत्याधिक कठिन है। कबीरदास जी ने इसे कोटि कल्प विश्राम- एक क्षण में समाहित करोड़ों वर्षो का विश्राम, कहा है। यह सजगता से युक्त गहनतम विश्राम की स्थिति है जो सभी प्रकार की पहचान से मुक्ति दिलाती है। 

? शिवतत्व
शिवतत्व सर्वव्याप्त है। अभिज्ञान, गहन समाधि में, स्वयं की चेतना में इसके अद्वैत स्वरूप के प्रति सजग रहते हुए, इसकी सघन व्यापकता के प्रति सजग होता है। यह ऐसे ही है जैसे कोई लहर कुशलतापूर्वक समुद्र की व्यापक विशालता के प्रति सजग रहे। जागरण का अर्थ केवल ऊंची आवाज में भजन गाना या बलपूर्वक स्वयं को जगाए रखना नहीं है। यह है स्वयं को जागृत रखना, आत्मोन्मुख होना एवं अपने अंदर उस विश्राम के प्रति सजग होना, जो नींद में आप को वैसे भी प्राप्त होता है। 

? रात्रिजागरण अभिप्राय
जागरण का अर्थ है अपने मन को आत्मोन्मुख करना। जब भी आप का मन स्वयं की ओर मुड़ता है, यह असजगता से पूर्ण नींद में चला जाता है। कई बार जब लोग ध्यान करते हैं, वे समझ नहीं पाते कि वे ध्यान में थे या सो रहे थे। जब वे इससे बाहर आते हैं, वे मन तथा इंद्रियों को अतुल्य विश्राम देने वाले, एक निश्चित सुख तथा स्थिरता का अनुभव करते हैं। शिव तथा शक्ति के मिलन की एक कहानी शिवरात्रि से संबंधित है। आदि तथा चैतन्य शक्ति का विश्वातीत से  गठबंधन है। शिव मौन साक्षी, चिदाकाश है तथा शक्ति, चित्ति अथवा चित्तविलास है, वह शक्ति जो इस अनंत आकाश में भिन्न-भिन्न आकार, विचार रचती है। केवल जागृत अवस्था में ही यह ज्ञान चेतना में प्राप्त होता है और शिवरात्रि सर्वव्याप्त चेतना की जागृति के उत्सव की रात है, निश्चेतन नींद में न जाते हुए, निश्चेतन नींद के स्वरूप के टूटने से आपको आभास होता है कि आप केवल यांत्रिक ढांचा नहीं बल्कि सृष्टि में एक महान कृति हैं। 

शिव तत्त्व के अनुभव के लिए आप को जागृत होना होगा।

? शिव हैं शाश्वत का प्रतीक
शिव को अपनी प्रिया देवी के साथ देखो। वे दो नहीं मालूम होते, एक ही हैं। यह एकता इतनी गहरी है कि प्रतीक बन गई है। ध्यान की पहली विधि शिव प्रेम से शुरू करते हैं: प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्य जीवन हो।
शिव प्रेम से शुरू करते हैं। पहली विधि प्रेम से संबंधित है क्योंकि तुम्हारे शिथिल होने के अनुभव में प्रेम का अनुभव निकटतम है। अगर तुम प्रेम नहीं कर सकते हो तो तुम शिथिल भी नहीं हो सकते। अगर तुम शिथिल हो सके तो तुम्हारा जीवन प्रेमपूर्ण हो जाएगा। एक तनावग्रस्त आदमी प्रेम नहीं कर सकता, क्योंकि तनावग्रस्त आदमी सदा उद्देश्य से, प्रयोजन से जीता है। हिसाब-किताब रखने वाला मन, तार्किक मन, प्रयोजन की भाषा में सोचने वाला मन प्रेम नहीं कर सकता। प्रेम सदा यहां है और अभी है। प्रेम का कोई भविष्य नहीं है। यही वजह है कि प्रेम ध्यान के इतने करीब है। मृत्यु भी ध्यान के इतने करीब है क्योंकि मृत्यु भी यहां है और अभी है, वह भविष्य में नहीं घटती। मृत्यु, प्रेम, ध्यान, सब वर्तमान में घटित होते हैं। इन तीनों को एक साथ रखना अजीब मालूम पड़ेगा। वह अजीब नहीं है। वे समान अनुभव हैं। इसलिए अगर तुम एक में प्रवेश कर गए तो शेष दो में भी प्रवेश पा जाओगे।

? शिव-शक्ति संवाद वर्णित प्रेम 
‘प्रिय देवी, प्रेम किए जाने के क्षण में प्रेम में ऐसे प्रवेश करो जैसे कि वह नित्य जीवन हो।’ पहली चीज कि प्रेम के क्षण में अतीत व भविष्य नहीं होते हैं। जब अतीत व भविष्य नहीं रहते तब क्या तुम इस क्षण को वर्तमान कह सकते हो? यह वर्तमान है दो के बीच, अतीत व भविष्य के बीच, यह सापेक्ष है। अगर अतीत व भविष्य नहीं रहे तो इसे वर्तमान कहने में क्या तुक है! इसलिए शिव वर्तमान शब्द का व्यवहार नहीं करते। वे कहते हैं, नित्य जीवन। उनका मतलब शाश्वत से है। शाश्वत में प्रवेश करो। अगर यह यात्रा क्षणिक न रहे, यह यात्रा ध्यानपूर्ण हो जाए, अर्थात अगर तुम अपने को भूल जाओ व प्रेमी-प्रेमिका विलीन हो जाएं व केवल प्रेम प्रवाहित होता रहे, 

तो शिव कहते हैं- शाश्वत जीवन तुम्हारा है। 
ॐ शिव पार्वती
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