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तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-72 असुरक्षा में जीना बुद्धत्व का मार्ग है। भाग-II
#1
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तंत्र-सूत्र-(भाग-5)-प्रवचन-72


असुरक्षा में जीना बुद्धत्व का मार्ग है-

दूसरा प्रश्न :

कल रात आपने कहा कि प्रेम जीवंत होता है क्योंकि असुरक्षित होता है, और विवाह मृत
होता है क्योंकि सुरक्षित होता है। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि प्रेम ही। आध्यात्मिक गहरई में विवाह बन जाता है?

नहीं। प्रेम कभी विवाह नहीं बनता। वह जितना गहरा जाता है उतना ही अधिक प्रेम बन जाता है लेकिन विवाह कभी नहीं बनता। विवाह से मेरा अर्थ है एक बाह्य बंधन, एक कानूनी स्वीकृति, एक सामाजिक समर्थन। और मैं कहता हूं कि प्रेम कभी विवाह नहीं बनता क्योंकि वह कभी सुरक्षित नहीं होता। वह प्रेम ही रहता है। वह अधिक प्रेम और अधिक प्रेम होता चला जाता है, लेकिन जितना अधिक होता है उतना ही असुरक्षित होता जाता है। कोई सुरक्षा नहीं होती। लेकिन यदि तुम प्रेम करते हो तो सुरक्षा की कोई फिक्र नहीं करते। जब तुम प्रेम नहीं करते तभी सुरक्षा की फिक्र होती है।
जब तुम प्रेम करते हो तो वह क्षण ही इतना पर्याप्त होता है कि तुम दूसरे क्षण की चिंता
नहीं करते भविष्य की चिंता नहीं करते। तुम्हें इससे कुछ मतलब नहीं होता कि कल क्या होगा, क्योंकि अभी जो हो रहा है पर्याप्त है, बहुत अधिक है। इतना अधिक है कि संभलता नहीं। तुम कोई चिंता नहीं करते।
मन में सुरक्षा की बात क्यों उठती है? यह चिंता भविष्य के कारण उठती है। वर्तमान पर्याप्त नहीं है इसलिए तुम भविष्य की चिंता करते हो। वास्तव में तुम वर्तमान में नहीं हो। तुम वर्तमान में नहीं जी रहे। तुम इसका आनंद नहीं ले रहे। यह क्षण आनंद नहीं है। वर्तमान आनंद नहीं है। इसलिए तुम भविष्य की आशा करते हो। फिर तुम भविष्य की योजना बनाते हो, फिर तुम भविष्य के लिए हर सुरक्षा जुटा लेना चाहते हो।

प्रेम कभी भी सुरक्षा जुटाना नहीं चाहता, वह स्वयं में ही सुरक्षित होता है। यही सत्य है। प्रेम स्वयं में ही इतना सुरक्षित होता है कि किसी और सुरक्षा की बात ही नहीं सोचता; भविष्य में क्या होगा, इससे कुछ मतलब ही नहीं है। क्योंकि भविष्य इसी वर्तमान से विकसित होगा। उसके बारे में चिंता क्यों करें?
जब वर्तमान आनंदपूर्ण नहीं होता, विषाद होता है, तब तुम भविष्य के लिए चिंतित होते हो। तब तुम उसे सुरक्षित करना चाहते हो। लेकिन याद रखी, कोई भी कुछ भी सुरक्षित नहीं कर सकता। प्रकृति का ऐसा स्वभाव नहीं है। भविष्य तो असुरक्षित रहेगा ही। तुम केवल एक काम कर सकते हो : वर्तमान को और गहनता से जी लो। तुम इतना ही कर सकते हो। यदि उससे कोई सुरक्षा होती है तो वही एकमात्र सुरक्षा है। और यदि सुरक्षा नहीं हो रही तो नहीं हो रही, कुछ भी किया नहीं जा सकता।
लेकिन हमारा मन सदा आत्मघाती ढंग से व्यवहार करता है। वर्तमान जितना विषादयुक्त होता है उतना ही तुम भविष्य के बारे में सोचते हो और उसे सुरक्षित करना चाहते हो। और जितने तुम भविष्य में जाओगे, वर्तमान उतना ही विषादयुक्त होता चला जाएगा। फिर तुम एक दुम्बक्र में फंस गए। यह चक्र तोड़ा जा सकता है, लेकिन इसे तोड़ने का एकमात्र उपाय यही है : वर्तमान क्षण इतनी गहनता से जीया जाए कि यह क्षण ही अपनी गहराई में शाश्वतता बन जाए। इसी से भविष्य पैदा होगा, भविष्य अपना मार्ग स्वयं बना लेगा, तुम्हें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है।
तो मैं कहता हूं कि प्रेम सुरक्षा के बारे में कभी नहीं सोचता, क्योंकि वह स्वयं में ही इतना सुरक्षित होता है। प्रेम कभी असुरक्षा से भयभीत नहीं होता। यदि जरा भी प्रेम है तो वह असुरक्षा से भयभीत नहीं होता। प्रेम असुरक्षित है, लेकिन प्रेम असुरक्षा से भयभीत नहीं होता। बल्कि, प्रेम असुरक्षा का आनंद लेता है क्योंकि असुरक्षा जीवन को रंग देती है, बदलती हुई ऋतुएं और मौसम देती है धार देती है। यही सौंदर्य है। बदलता हुआ जीवन सुंदर होता है, क्योंकि सदा ही आविष्कृत करने के लिए कुछ शेष रहता है, सदा ही किसी ऐसी चीज से साक्षात्कार होता है जो नई है।
वास्तव में दो प्रेमी सतत एक-दूसरे में नए-नए आविष्कार करते रहते हैं। और गहराई असीम है। एक प्रेम से भरा हृदय असीम है अनंत है। तुम उसे कभी समाप्त नहीं कर सकते। उसका कोई अंत नहीं है। वह बढ़ता ही चला जाता है, आगे फैलता चला जाता है। वह आकाश जैसा ही विशाल है।
प्रेम असुरक्षा की परवाह नहीं करता, प्रेम उसका आनंद ले सकता है। इससे एक पुलक मिलती है। जो प्रेम नहीं कर सकते वे ही असुरक्षा से डरते हैं, क्योंकि उनकी जड़ें जीवन में नहीं जमी हुई हैं। जो प्रेम नहीं कर सकते, वे जीवन में सदा सुरक्षित रहते हैं। वे सुरक्षित करने में ही अपना जीवन व्यर्थ कर देते हैं, और जीवन सुरक्षित कभी होता नहीं, हो नहीं सकता।

सुरक्षा मृत्यु का गुण है; सुरक्षा मृत्यु का गुणधर्म है। जीवन असुरक्षित है, अरि प्रेम इससे नहीं डरता। प्रेम जीवन से, असुरक्षा से नहीं डरता, क्योंकि वह धरती में थिर होता है।’ यदि तुम धरती में थिर नहीं हो और देखो कि झंझावात आ रहा है तो तुम डर जाओगे। लेकिन यदि तुम धरती में थिर हो तो तुम झंझावात का स्वागत करोगे, वह एक पुलक बन जाएगा। यदि तुम थिर हो तो आता हुआ झंझावात एक चुनौती बन जाएगा, उससे तुम्हारी जड़ें हिल जाएंगी, हर तंतु जीवंत हो उठेगा। फिर जब झंझावात गुजर जाएगा तो तुम यह नहीं सोचोगे कि यह बुरा था, कोई दुर्भाग्य था। तुम कहोगे कि यह तो सौभाग्य था, एक आशीर्वाद था, क्योंकि झंझावात ने सारी मृतवत्ता दूर कर दी। जो कुछ भी मृत था वह उसके साथ बह गया और जो भी जीवंत था वह और जीवंत हो गया।
जब झंझावात गुजर जाए तो वृक्षों की ओर देखो। वे जीवन से तरंगायित हैं, जीवन से धड़क रहे हैं, दीप्तिमान हैं, जीवंत हैं ऊर्जा उन्हें ओत-प्रोत कर रही है। क्योंकि झंझावात ने एक अवसर दिया उन्हें अपनी जड़ों को अनुभव करने का, अपनी थिरता को अनुभव करने का। यह स्वयं के अनुभव का एक अवसर था।
तो जो प्रेम में थिर है वह किसी भी चीज से नहीं डरता। जो कुछ भी आए सुंदर है-परिवर्तन आए, असुरक्षा आए। जो भी होता है शुभ है 1 लेकिन प्रेम कभी विवाह नहीं बनता। और जब मैं कहता हूं कि प्रेम विवाह नहीं बन सकता तो मेरा यह अर्थ नहीं है कि प्रेमियों को विवाह नहीं करना चाहिए, लेकिन यह विवाह प्रेम का विकल्प नहीं बन जाना चाहिए। यह केवल बाहरी आवरण होना चाहिए, यह विकल्प नहीं होना चाहिए।
और प्रेम कभी विवाह नहीं बनता, क्योंकि प्रेमी कभी एक-दूसरे के प्रति सुनिश्चित धारणा नहीं रखते कोई प्रतिमा नहीं रखते। मेरा जो अर्थ है वह गहन रूप से मनोवैज्ञानिक है, प्रेमी एक-दूसरे के प्रति कभी तय नहीं होते, कोई धारणा नहीं रखते। एक बार तुम एक-दूसरे के प्रति सुनिश्चित हो जाओ तो दूसरा एक वस्तु बन गया। अब वह व्यक्ति न रहा। तो विवाह प्रेमियों को वस्तुओं में बदल देता है। पति एक वस्तु है पत्नी एक वस्तु है, उनके बारे में पहले से ही भविष्यवाणी की जा सकती है।
मैं पूरे देश में बहुत से परिवारों में ठहरता रहा हूं और मुझे बहुत से पति-पत्नियों को जानने का अवसर मिला है। वे व्यक्ति हैं ही नहीं। उनके बारे में पहले से सब कुछ बताया जा सकता है। यदि पति कुछ कहे तो यह बताया जा सकता है कि पत्नी क्या कहेगी, कैसे व्यवहार करेगी। और यदि पत्नी यंत्रवत रूप से कुछ कहती है तो पति भी यंत्रवत उत्तर देगा।
यह सब सुनिश्चित है। वे वही अभिनय बार-बार कर रहे हैं। उनका जीवन बस उस ग्रामोफोन रिकार्ड की तरह है जिसमें कुछ गड़बड़ी हो जाए जिसमें सुई एक जगह अटक जाए और वह बार-बार वही दोहराता जाए। यह इतना ही सुनिश्चित है। तुम बता सकते हो कि आगे क्या होने वाला है। पति और पत्नी कहीं अटक गए हैं वे ग्रामोफोन रिकार्ड बन गए हैं और दोहराए चले जाते हैं। वह पुनरुक्ति ही ऊब पैदा करती है।
मैं एक घर में ठहरा हुआ था। पति ने मुझसे कहा, 'मैं तो अपनी पत्नी के साथ अकेला रहने से डरने लगा हूं। जब कोई और साथ होता है तभी हम दोनों सुखी होते हैं। हम किसी दूसरे को साथ लिए बिना छुट्टी पर भी नहीं जा सकते, क्योंकि वह दूसरा कुछ नवीनता लाता है। वरना तो हम जानते ही हैं कि क्या होने वाला है। यह सब इतना सुनिश्चित हो गया है कि किसी योग्य ही नहीं रहा। हम पहले से ही सब जानते हैं। यह ऐसे ही है जैसे तुम उसी किताब को बार-बार और बार-बार पढ़ते जाओ।'
प्रेमियों के बारे में पहले से भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। यही असुरक्षा है। तुम नहीं जानते कि क्या होने वाला है। और यही सौंदर्य है। तुम नए और युवा और जीवंत रह सकते हो। लेकिन हम एक-दूसरे को वस्तु बना लेना चाहते हैं, क्योंकि वस्तु आसानी से नियंत्रित की जा सकती है। और तुम्हें वस्तु से डरने की भी जरूरत नहीं होती। तुम जानते हो कि वह कहां है उसका व्यवहार क्या है। तुम पहले से ही योजना बना सकते हो कि क्या करना है और क्या नहीं करना है।
विवाह से मेरा अर्थ है एक ऐसी व्यवस्था जिसमें दो व्यक्ति वस्तुओं के तल पर गिर जाते हैं। प्रेम कोई व्यवस्था नहीं है यह तो एक साक्षात्कार है- क्षण- क्षण, जीवंत। निश्चित ही खतरे से भरा है, पर जीवन ऐसा ही है। विवाह सुरक्षित है उसमें कोई खतरा नहीं है; प्रेम असुरक्षित है। तुम नहीं जानते कि क्या होने वाला है अगला क्षण अज्ञात है, और अज्ञात ही रहता है।
तो प्रेम हर क्षण अज्ञात में प्रवेश है। जब जीसस कहते हैं 'परमात्मा प्रेम है', तो उनका यही अर्थ है। परमात्मा उतना ही अज्ञात है जितना प्रेम। और यदि तुम जीवंत होने को, प्रेम में होने को, असुरक्षित होने को तैयार नहीं हो तो तुम परमात्मा में प्रवेश नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो परम असुरक्षा है परम अज्ञात है।
तो प्रेम तुम्हें प्रार्थना के लिए तैयार करता है। यदि तुम प्रेम कर सको, और किसी अज्ञात व्यक्ति को बिना वस्तु बनाए, बिना यंत्रवत व्यवहार के क्षण- क्षण जीते हुए प्रेम कर सको तो तुम प्रार्थना के लिए तैयार हो रहे हो।
प्रार्थना और कुछ नहीं प्रेम ही है समस्त अस्तित्व के प्रति प्रेम। तुम अस्तित्व के साथ ऐसे जीते हो जैसे अपने प्रेमी के साथ जी रहे हो। न तुम्हें भाव-दशा का पता है, न ऋतु का पता है, तुम्हें कुछ पता ही नहीं कि क्या होने वाला है। कुछ भी ज्ञात नहीं है। तुम बस उघाडते चले जाते हो-यह एक अनंत यात्रा है।

तीसरा प्रश्न :

क्या ऐसा हो सकता है कि जो व्यक्ति संबुद्ध नहीं है वह पूर्ण असुरक्षा में जीए और फिर
भी संतप्त, हताश और दुखी न हो?

पूर्ण असुरक्षा और उसमें जीने की क्षमता बुद्धत्व के पर्याय हैं। तो जो व्यक्ति संबुद्ध नहीं है वह पूर्ण असुरक्षा में नहीं रह सकता और जो पूर्ण असुरक्षा में नहीं रह सकता वह संबुद्ध नहीं हो सकता। ये दो बातें नहीं हैं, ये एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। तो तुम असुरक्षा में रहने की तब तक प्रतीक्षा न करो जब तक तुम संबुद्ध न हो जाओ, नहीं! क्योंकि फिर तो तुम कभी संबुद्ध न हो पाओगे।
असुरक्षा में जीना शुरू करो, यही बुद्धत्व का मार्ग है। और पूर्ण असुरक्षा के बारे में मत सोचो। जहां तुम हो वहीं से शुरू करो। जैसे तुम हो वैसे तो किसी चीज में समग्र नहीं हो सकते लेकिन कहीं से तो शुरू करना ही होता है। शुरू में इससे संताप होगा, शुरू में इससे दुख होगा। लेकिन बस शुरू में ही। यदि तुम शुरुआत पार कर सको, यदि तुम शुरुआत सह का, दुख मिट जाएगा, सताप मिट जाएगा।
इस प्रक्रिया को समझना पड़ेगा। जब तुम असुरक्षित अनुभव करते हो तो संतप्त क्यों होते हो? यह असुरक्षा के कारण नहीं बल्कि सुरक्षा की मांग के कारण है। जब तुम असुरक्षित अनुभव करते हो तो संतप्त हो जाते हो संताप पैदा होता है। वह असुरक्षा के कारण पैदा नहीं हो रहा बल्कि जीवन को एक सुरक्षा बनाने की मांग से पैदा हो रहा है। यदि तुम असुरक्षा में रहने तंगी और सुरक्षा की मांग न करो तो जब मांग चली जाएगी तो संताप भी चला जाएगा। वह मांग ही संताप पैदा कर रही है।
असुरक्षा जीवन का स्वभाव है। बुद्ध के लिए संसार असुरक्षित है; जीसस के लिए भी असुरक्षित है। लेकिन वे संतप्त नहीं हैं क्योंकि उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है। वे इस वास्तविकता की स्वीकृति के लिए प्रौढ़ हो गए हैं।
प्रौढ़ता और अप्रौढ़ता की मेरी यही परिभाषा है। उस व्यक्ति को मैं अपरिपक्व कहता हूं जो कल्पनाओं और सपनों के लिए वास्तविकता से लड़ता रहता है। वह व्यक्ति अपरिपक्व है। प्रौढ़ता का अर्थ है वास्तविकता का साक्षात्कार करना, सपनों को एक ओर फेंक देना और वास्तविकता जैसी है वैसी स्वीकार कर लेना।
बुद्ध प्रौढ़ हैं। वह स्वीकार कर लेते हैं कि यह ऐसा ही है।
उदाहरण के लिए, हालांकि मृत्यु सुनिश्चित है, पर अपरिपक्व व्यक्ति सोचे चला जाता है कि बाकी सब चाहे मर जाएं लेकिन वह नहीं मरने वाला। अपरिपक्व व्यक्ति सोचता है कि उसके मरने के समय तक कुछ खोज लिया जाएगा, कोई दवा खोज ली जाएगी, जिससे वह नहीं मरेगा। अपरिपक्व व्यक्ति सोचता है कि मरना कोई नियम नहीं है। निश्चित ही, बहुत से लोग मरे हैं लेकिन हर चीज में अपवाद होते हैं और वह सोचता है कि वह अपवाद है।
जब भी कोई मरता है तो तुम सहानुभूति अनुभव करते हो, तुम्हें लगता है, बेचारा मर गया। लेकिन तुम्हारे मन में यह कभी नहीं आता कि उसकी मृत्यु तुम्हारी मृत्यु भी है। नहीं, तुम उससे बचकर निकल जाते हो। इतनी सूक्ष्म बातों को तो तुम छूते ही नहीं। तुम सोचते रहते हो कि कुछ न कुछ तुम्हें बचा लेगा-कोई मंत्र, कोई चमत्कारी गुरु। कुछ हो जाएगा और तुम बच जाओगे। तुम कहानियों में बच्चों की कहानियों में जी रहे हो।
प्रौढ़ व्यक्ति वह है जो इस तथ्य की ओर देखता है और स्वीकार कर लेता है कि जीवन और मृत्यु साथ-साथ हैं। मृत्यु जीवन का अंत नहीं है वह तो जीवन का शिखर है। वह जीवन के साथ घटी कोई दुर्घटना नहीं है वह तो जीवन के हृदय में विकसित होती है। विकसित होती है और एक शिखर पर पहुंचती है। तो प्रौढ़ व्यक्ति स्वीकार कर लेता है और मृत्यु का कोई भय नहीं रहता। वह समझ लेता है कि सुरक्षा असंभव है।
तुम चाहे एक चारदीवारी बना लो, बैंक बैलेंस रख लो, स्वर्ग में सुरक्षा पाने के लिए धन दान दे दो तुम सब कर लो लेकिन गहरे में तुम जानते हो कि असल में कुछ भी सुरक्षित नहीं है। बैंक तुम्हें धोखा दे सकता है। और पुरोहित धोखेबाज हो सकता है, वह सबसे बड़ा धोखेबाज हो सकता है, कोई नहीं जानता। वे चिट्ठियां लिख देते...... ।
भारत में मुसलमानों का एक संप्रदाय है, उसका प्रधान पुरोहित परमात्मा के नाम चिड़िया लिखता है। तुम कुछ धन दान दे दो और वह चिट्ठी लिख देगा। चिट्ठी तुम्हारे साथ तुम्हारे मकबरे में, तुम्हारी कब में रख दी जाएगी। वह तुम्हारे साथ रख दी जाएगी ताकि तुम उसे दिखा सको। धन पुरोहित के पास चला जाता है और चिट्ठी तुम्हारे साथ चली जाती लेकिन कुछ भी तो सुरक्षित नहीं हुआ।
परिपक्व व्यक्ति वास्तविकता का सामना करता है, वह उसको जैसी है वैसी ही स्वीकार कर लेता है। वह कुछ मांग नहीं करता। वह मांगने वाला नहीं होता। वह यह नहीं कहता कि यह ऐसे होना चाहिए। वह तथ्य की ओर देखता है और कहता है, 'हा, यह ऐसा है।’ वास्तविकता का सीधा साक्षात्कार तुम्हारे लिए दुखी होना असंभव कर देगा। क्योंकि दुख तभी आता है जब तुम कुछ मांग करते हो। असल में दुख और कुछ नहीं बस इसी बात का संकेत है कि तुम वास्तविकता के विपरीत चल रहे हो। और वास्तविकता तुम्हारे अनुसार नहीं बदल सकती, तुम्हें वास्तविकता के अनुसार बदलना पड़ेगा। तुम्हें स्वयं को छोड़ना पड़ेगा। तुम्हें समर्पण करना पड़ेगा।
समर्पण का यही अर्थ है : तुम्हें स्वयं को छोड़ना पड़ेगा। वास्तविकता समर्पण नहीं कर सकती, वह तो जैसी है वैसी है। जब तक तुम समर्पण न करो, तुम दुखी रहोगे। दुख तुम्हारे द्वारा ही निर्मित होता है क्योंकि तुम संघर्ष करते हो।
यह ऐसे ही है जैसे नदी की धारा सागर की तरफ बह रही हो और तुम धारा के विपरीत तैरने की कोशिश कर रहे हो। तुम्हें लगता है कि नदी तुम्हारे विरुद्ध है। नदी तुम्हारे विरुद्ध नहीं है। उसने तो तुम्हारे बारे में सुना भी नहीं है। वह तुम्हें जानती भी नहीं है। नदी तो बस सागर की ओर बहे जा रही है। यह नदी का स्वभाव है कि सागर की ओर बहे, सागर की ओर चले और उसमें समाहित हो जाए। तुम धारा के विपरीत जाने की कोशिश कर रहे हो।
और हो सकता है किनारे पर कुछ मूरख खड़े हों जो तुम्हें बढ़ावा दे रहे हों : 'तुम बहुत अच्छा कर रहे हो। कोई फिक्र न करो देर-अबेर नदी को समर्पण करना पड़ेगा। तुम तो महान हो, चलते रहो! जो महान हैं उन्होंने नदी पर विजय पाई है !' सदा ऐसे मूरख लोग होते ही हैं जो तुम्हें प्रेरणा देते हैं, तुम्हारा हौसला बढ़ाते हैं। लेकिन कोई सिकंदर, कोई नेपोलियन, कोई महान व्यक्ति उलटा स्रोत तक नहीं पहुंच सका। देर-अबेर नदी की विजय होती है। लेकिन मरने के बाद तुम वह आनंद नहीं ले सकते जो तब संभव था जब तुम जीवित थे : समर्पण का आनंद, स्वीकृति का आनंद, नदी के साथ ऐसे एक हो जाने का आनंद कि कोई संघर्ष न बचे। लेकिन किनारे पर खड़े वे मूर्ख लोग कहेंगे 'तुमने समर्पण कर दिया, तुम हार गए, तुम असफल हुए।’ उनकी मत सुनो उस तरिक स्वतंत्रता का आनंद लो जो समर्पण से आती है। उनकी मत सुनो।
जब बुद्ध ने धारा के विपरीत तैरने की कोशिश छोड़ दी तो जो उनको जानते थे, उन्होंने कहा, तुम भगोड़े हो। तुम पराजित हो। तुमने हार मान ली। दूसरे क्या कहते हैं वह मत सुनो। भीतर के भाव को अनुभव करो। तुम्हें क्या घट रहा है उसको अनुभव करो। यदि धारा के साथ बहने में तुम्हें अच्छा लगता है तो यही मार्ग है। यही ताओ है तुम्हारे लिए। किसी की मत सुनो, बस अपने हृदय की सुनो। प्रौढ़ता है यथार्थ का स्वीकार।
मैंने एक कहानी सुनी है। एक मुसलमान, एक ईसाई और एक यहूदी से एक प्रश्न पूछा गया। प्रश्न एक ही था। किसी ने उन तीनों से पूछा, 'यदि तूफानी लहरें सागर को जमीन पर आएं तुम उसमें डूब जाओ तो तुम क्या करोगे?' ईसाई ने कहा, 'मैं अपने हृदय पर क्रास का चिह्न बनाऊंगा और परमात्मा से प्रार्थना करूंगा कि मुझे स्वर्ग में आने के लिए द्वार खोल दे।’ मुसलमान ने कहा, 'मैं अल्लाह का नाम लूंगा और कहूंगा कि यही किस्मत है, यही भाग्य है, और डूब जाऊंगा।’ यहूदी ने कहा, 'मैं परमात्मा को धन्यवाद दूंगा, उसकी मर्जी को स्वीकार करूंगा और पानी के नीचे रहना सीख लूंगा।’
यही करना है। अस्तित्व की मर्जी को, विराट की मर्जी को स्वीकार करना है और उसमें जीना सीखना है। यही सारी कला है। प्रौढ़ व्यक्ति यथार्थ को स्वीकार कर लेता है, कोई मांग नहीं करता, किसी स्वर्ग की बात नहीं करता। ईसाई मांग कर रहा था, वह मांग रहा था, वह कह रहा था, स्वर्ग के द्वार खोल दो। लेकिन वह भी निराशावादी है जो बस स्वीकार कर लेता है और डूब जाता है। मुसलमान भी यही कर रहा था। यहूदी ने स्वीकार किया, बल्कि स्वागत किया और कहा, यही उसकी मर्जी है, अब मुझे पानी के नीचे रहना सीखना है। यही परमात्मा की मर्जी है। वास्तविकता को ऐसा का ऐसा स्वीकार कर लो, और सीखो कि समर्पित हृदय, समर्पित चित्त के साथ उसमें कैसे जीना है।


अंतिम प्रश्न :

कल आपने कहा कि जीवन और मृत्यु साथ-साथ हैं। फिर कृपया बताएं कि अतिक्रमण
की क्या आवश्यकता है? 

यही आवश्यकता है। इसीलिए आवश्यकता है। जीवन मृत्यु के साथ ही हैं--यदि तुम इसे समझ सको तो तुमने अतिक्रमण कर लिया।
तुम जीवन को स्वीकार करते हो, मृत्यु को स्वीकार नहीं करते। या कि करते हो? तुम जीवन को स्वीकार करते हो लेकिन मृत्यु को अस्वीकार करते हो, और इसी कारण तुम सदा कठिनाई में रहते हो। तुम कठिनाई में पड़ते हो क्योंकि मृत्यु जीवन का अंग है, जब तुम जीवन को अस्वीकार करते हो तो मृत्यु तो होगी ही, लेकिन तुम मृत्यु को अस्वीकार कर देते हो। जब तुमने मृत्यु को अस्वीकार किया तो जीवन को भी अस्वीकार कर दिया, क्योंकि वे दो नहीं हैं। तो तुम कठिनाई में रहोगे। या तो पूरे को स्वीकार करो या पूरे को अस्वीकार करो। यही अतिक्रमण है।
और अतिक्रमण करने के दो उपाय है। या तो जीवन और मृत्यु दोनों को एक साथ स्वीकार करो, या दोनों को एक साथ अस्वीकार करो, तब तुम अतिक्रमण कर गए। यही दो उपाय हैं, विधायक और नकारात्मक। नकारात्मक कहता है, 'दोनों को अस्वीकार कर दो।’ विधायक कहता है, 'दोनों को स्वीकार कर लो।’ लेकिन जोर इस बात पर है कि दोनों साथ होने चाहिए, चाहे स्वीकार करो चाहे अस्वीकार करो। जब जीवन और मृत्यु दोनों होते हैं तो एक-दूसरे को काट डालते हैं। और जब वे दोनों ही नहीं रहते तो तुम अतिक्रमण कर जाते हो।
तुम या तो जीवन से जुड़े होते हो या कभी-कभी मृत्यु से, लेकिन तुम कभी दोनों को स्वीकार नहीं करते। मैं कई लोगों से मिला हूं जो जीवन से इतने हताश हो गए हैं. कि वे आत्महत्या करने की सोचने लगते हैं। पहले उनका जीवन में रस होता है, फिर जीवन उबाने लगता है। ऐसा नहीं कि जीवन उबाता है, वह मोह उबाता है, लेकिन लोग सोचते हैं कि जीवन उबा रहा है। तो वे मृत्यु में रस लेने लगते हैं। अब वे सोचने लगते हैं कि अपने को कैसे नष्ट कर लें और कैसे आत्महत्या कर लें, कैसे मर जाएं। लेकिन मोह तो है ही। पहले जीवन का था, अब मृत्यु का है। तो जो व्यक्ति जीवन के मोह में है और जो व्यक्ति मृत्यु के मोह में है, वे भिन्न नहीं हैं। मोह तो है ही और मोह ही समस्या है। दोनों को स्वीकार करो।
जरा सोचो, यदि तुम जीवन और मृत्यु दोनों को स्वीकार कर लोगे तो क्या होगा? तत्क्षण एक मौन उतर आएगा, क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे को काट डालेंगे। जब तुम स्वीकार कर लेते हो तो जीवन और मृत्यु दोनों समाप्त हो जाते हैं, तब तुम अतिक्रमण कर गए तुम पार चले गए। या दोनों को अस्वीकार कर दो-यह एक ही बात है।
अतिक्रमण का अर्थ है द्वैत के पार चले जाना। मोह का अर्थ है द्वैत में रहना, एक में रस लेना और दूसरे के विपरीत होना। जब तुम दोनों को स्वीकार करते हो या दोनों को अस्वीकार करते हो तो मोह गिर जाता है। तुम्हारी गांठ खुल जाती है। अचानक तुम अपने प्राणों के तीसरे आयाम पर पहुंच जाते हो, जहां न जीवन है न मृत्यु। वही निर्वाण है, वही मोक्ष है। वहां द्वैत नहीं है, अद्वैत है, तथाता है। और जब तक तुम अतिक्रमण न कर जाओ, तुम सदा दुख में ही रहोगे। भले ही तुम अपने मोह को इससे हटाकर उस पर लगा लो, लेकिन तुम दुख में ही रहोगे।
मोह दुख पैदा करता है। अस्वीकार भी दुख पैदा करता है। तुम कुछ भी चुन सकते हो, यह तुम पर निर्भर है। तुम कृष्ण की तरह विधायक मार्ग चुन सकते हो। वह कहते हैं, 'स्वीकार करो। दोनों को स्वीकार करो।’ या तुम बुद्ध का मार्ग चुन सकते हो। बुद्ध कहते हैं, 'दोनों को अस्वीकार करो।’ लेकिन दोनों को साथ-साथ कर लो, फिर अतिक्रमण तत्क्षण होता है। यदि तुम दोनों के बारे में सोचो भी तो भी अतिक्रमण हो जाएगा। और यदि वास्तविक जीवन में तुम यह कर पाओ तो एक नई चेतना का आविर्भाव होगा। वह चेतना द्वैत के जगत की नहीं है, वह एक अज्ञात जगत की चेतना है-निर्वाण के जगत की।

आज इतना ही।
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